“म्यर गों म्यर नाव” – राजेंद्र सिंह भंडारी की स्वरचित कविता

भल समझछा गौनों कैं गों रहौंण दियो
इंशानियतक ज्यौंन तुम नों रहौंण दियो
नी सोंपो विज्ञान तकनीक कैं सब काम
यों खेतों में झुंगर मनु जौं रहौंण दियो
नी हौंन विकास हिंदी अंग्रेजी बुलै भेर
कां किलै कओ कहां क्यों रहौंण दियो
नी करो बेमानी पामोलिन मिलै भे तुम
एक पौ भरि सही शुद्ध घ्यों रहौंण दियो
छोड़ो अनाप शनाप जहर खाण पीण
सिसौड़क साग खाओ च्यों रहौंण दियो
दार शकल सूरत देखो बहौण बलदकि
को बलद छू दैण को छू बौं रहौंण दियो
साधन भौत हागीन पहाड़ में कमायिक
ईजा के करूं पहनूं के खौं रहौंण दियो
खुशिल काटो जिंदगी शुद्ध हाव पाणीम
स्वस्थ छह तुम यां कसि मरौं रहौंण दियो
एक कमरम करनि गुजार लोग शहर में
सार गों नाव तुमर छू कां रौं रहौंण दियो 

राजेंद्र सिंह भंडारी